कई महीनों से अटकी भारत-अमेरिका ट्रेड डील आखिरकार एक बड़े मोड़ पर पहुंच गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने अचानक ऐलान कर दिया कि भारतीय उत्पादों पर लगाए गए भारी टैरिफ को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किया जा रहा है। यह फैसला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि कुछ समय पहले तक अमेरिका भारत पर लगातार दबाव बना रहा था और बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही थी। अब सवाल उठता है कि आखिर ट्रंप अचानक क्यों झुक गए और इस नरमी के पीछे असली वजह क्या है?
दरअसल, भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर लंबे समय से बातचीत चल रही थी, लेकिन बार-बार अड़चनें आ रही थीं। अमेरिका ने तो दबाव बनाने के लिए कुछ भारतीय सामानों पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगा दिया था। ट्रंप प्रशासन का साफ संदेश था कि अगर भारत को राहत चाहिए तो उसे रूस से कच्चा तेल खरीदना कम या बंद करना होगा। अमेरिका चाहता था कि रूस की तेल से होने वाली कमाई घटे ताकि यूक्रेन युद्ध को लेकर उस पर आर्थिक दबाव बढ़ाया जा सके।
हालांकि अब ट्रंप ने दावा किया है कि भारत रूस से तेल खरीदने पर लगभग सहमत हो गया है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री Narendra Modi ने टैरिफ घटाने के फैसले का स्वागत जरूर किया, लेकिन रूस से तेल खरीदने को लेकर कोई खुला बयान नहीं दिया। यही वजह है कि इस डील को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और बड़ा फैक्टर सामने आया है — भारत और European Union के बीच हाल ही में हुई बड़ी ट्रेड डील। मीडिया रिपोर्ट्स, खासतौर पर Newsweek के अनुसार, भारत और यूरोपीय संघ के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट लगभग तय हो चुका है, जिसे अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक साझेदारी में से एक माना जा रहा है। इस समझौते से भारत की वैश्विक बाजार में ताकत और बढ़ गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यही डील अमेरिका के लिए खतरे की घंटी साबित हुई। ट्रंप प्रशासन को डर था कि अगर भारत यूरोप के साथ मजबूत व्यापारिक रिश्ते बना लेता है तो अमेरिका पीछे रह सकता है। ऐसे में भारत को अपने पाले में बनाए रखने के लिए टैरिफ में नरमी दिखाना जरूरी हो गया।
घटनाक्रम भी काफी दिलचस्प रहा। ट्रेड डील के ऐलान से कुछ देर पहले भारत में नए अमेरिकी राजदूत ने सोशल मीडिया पर इशारा किया कि ट्रंप और मोदी के बीच बातचीत हुई है और बड़ा फैसला आने वाला है। इसके तुरंत बाद टैरिफ कटौती की घोषणा कर दी गई। इससे साफ हो गया कि यह फैसला निचले स्तर पर नहीं, बल्कि सीधे शीर्ष नेतृत्व द्वारा लिया गया।
अमेरिका के लिए यह मुद्दा सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है। यह ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक राजनीति से भी जुड़ा हुआ है। White House लंबे समय से चाहता है कि रूस की तेल आय पर लगाम लगे। अमेरिकी वित्त मंत्री Scott Bessent भी हाल ही में कह चुके हैं कि भारत द्वारा रूस से तेल आयात लगभग खत्म होने की कगार पर है, जिससे टैरिफ में राहत का रास्ता साफ हुआ।
ट्रंप ने यह भी संकेत दिया है कि भविष्य में भारत अमेरिका से ज्यादा तेल खरीदेगा और जरूरत पड़ने पर वेनेजुएला जैसे देशों से भी आयात कर सकता है। इसका मकसद यह है कि अगर मध्य पूर्व या रूस से जुड़े हालात बिगड़ते हैं तो वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में अचानक उछाल न आए।
राजनीतिक नजरिए से देखें तो इस डील से दोनों नेताओं को फायदा होता दिख रहा है। ट्रंप इसे अपनी सख्त व्यापार नीति की जीत के तौर पर पेश कर सकते हैं और यह दिखा सकते हैं कि उन्होंने टैरिफ के जरिए रूस पर दबाव बनाया। वहीं मोदी सरकार को कम टैरिफ के रूप में भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ी राहत मिली है, जिससे अमेरिका के बाजार में भारत की पकड़ मजबूत हो सकती है।
इसके अलावा अमेरिका चाहता है कि भारत चीन के विकल्प के रूप में एक बड़ा मैन्युफैक्चरिंग और रणनीतिक साझेदार बने। भारत भी तकनीक, निवेश और रक्षा सहयोग के क्षेत्र में अमेरिका से नजदीकी रिश्तों का ठोस फायदा देखना चाहता है।
कुल मिलाकर, ट्रंप का अचानक झुकना सिर्फ उदारता नहीं बल्कि बदली हुई वैश्विक व्यापार रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत और यूरोप के साथ मजबूत होती साझेदारी ने अमेरिका को यह समझा दिया कि अब दबाव की जगह साझेदारी का रास्ता ज्यादा फायदेमंद है। यही वजह है कि महीनों की तनातनी के बाद आखिरकार ट्रेड डील पर सहमति बन सकी।
Correspondent – Shanwaz Khan


