नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति अब अमेरिका की जनता और कंपनियों पर भारी पड़ रही है। ट्रंप ने हाल ही में कई देशों से आयातित वस्तुओं पर भारी टैरिफ लगाया था, लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इसका नुकसान खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था को झेलना पड़ रहा है।
अमेरिका पर पड़ा उल्टा असर
ट्रंप प्रशासन ने दुनिया के कई देशों पर व्यापारिक कर (टैरिफ) बढ़ाया है, जिसमें भारत पर 50% तक और रूस से कच्चे तेल पर 25% अतिरिक्त टैरिफ शामिल है।
हालांकि जानकारों के अनुसार, इस नीति से विदेशी देशों को नहीं बल्कि अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है।
गीता गोपीनाथ का बयान
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर और आईएमएफ (IMF) की पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने कहा कि ट्रंप की टैरिफ नीति “अमेरिका पर टैक्स” की तरह काम कर रही है।
उन्होंने एक्स (Twitter) पर पोस्ट करते हुए लिखा —
“टैरिफ लगाए छह महीने हो चुके हैं। सरकार का राजस्व जरूर बढ़ा है, लेकिन यह पैसा अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं से ही आया है। यानी इन टैरिफ ने आम अमेरिकियों पर टैक्स की तरह असर डाला है।”
गोपीनाथ के अनुसार, टैरिफ से न तो व्यापार संतुलन सुधरा, न ही मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को कोई बढ़ावा मिला।
उन्होंने कहा,
“महंगाई थोड़ी बढ़ी है, खासकर घरेलू सामान, फर्नीचर और कॉफी जैसी वस्तुओं में। कुल मिलाकर, इन टैरिफ का स्कोरकार्ड निगेटिव है।”
विशेषज्ञों ने जताई चिंता
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के डीन एंड्रेस वेलास्को ने कहा कि ट्रंप के टैरिफ राजनीतिक मकसद से लगाए गए हैं, न कि आर्थिक सुधार के लिए।
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका ने यह नीति जारी रखी, तो वह वैश्विक व्यापार में अलग-थलग पड़ सकता है।
निष्कर्ष
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ट्रंप की टैरिफ नीति से अल्पकालिक राजस्व तो बढ़ा, लेकिन दीर्घकालिक नुकसान ज्यादा है।
इससे न केवल अमेरिकी उपभोक्ताओं की जेब पर असर पड़ा है, बल्कि अमेरिका की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति भी कमजोर हो सकती है।


