काबुल/इस्लामाबाद — अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा विवाद और आतंकवाद को लेकर पुराना तनाव एक बार फिर उभर आया है। डूरंड रेखा के पास दोनों देशों की सेनाओं के बीच हाल ही में हुई झड़पों ने हालात को बेहद नाजुक बना दिया है। अफगान मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, तालिबान लड़ाकों के जवाबी हमले के दौरान पाकिस्तानी सैनिकों को कई अग्रिम चौकियां छोड़कर पीछे हटना पड़ा।
अफगान पत्रकार दाउद जुनबिश ने दावा किया कि इस झड़प के दौरान तालिबान ने पाकिस्तानी सैनिकों के हथियार जब्त किए और कुछ सीमा चौकियों पर नियंत्रण हासिल कर लिया। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो क्लिप्स में अफगान लड़ाके पाकिस्तानी चौकियों में घूमते और वहां मौजूद सैन्य उपकरणों को प्रदर्शित करते नजर आ रहे हैं। इन फुटेज की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है, लेकिन घटनाओं ने दोनों देशों के बीच बढ़ते अविश्वास को रेखांकित किया है।
सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान ने हाल ही में काबुल के निकट स्थित इलाकों में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के कथित ठिकानों पर हवाई हमले किए थे। इस कार्रवाई को पाकिस्तान ने आतंकी ठिकानों के सफाए की कवायद बताया, लेकिन काबुल स्थित तालिबान सरकार ने इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन करार दिया।
तालिबान के रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि “पाकिस्तान ने हमारे क्षेत्र पर हमला कर अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के नियमों का उल्लंघन किया है। हम अपनी जमीन की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार हैं।” दूसरी ओर, इस्लामाबाद का कहना है कि उसकी कार्रवाई केवल आतंकवादियों को निशाना बनाने तक सीमित थी और इसका उद्देश्य अफगानिस्तान की सत्ता को चुनौती देना नहीं था।
तनाव बढ़ने के बाद दोनों देशों की सैन्य नेतृत्व के बीच संपर्क स्थापित करने की कोशिश की गई, जिसके परिणामस्वरूप 48 घंटे के लिए एक अस्थायी युद्धविराम (सीजफायर) पर सहमति बनी। स्थानीय सूत्रों का कहना है कि हालांकि यह समझौता प्रभावी हुआ है, लेकिन सीमा के कुछ इलाकों में छिटपुट गोलाबारी अब भी जारी है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने दोनों देशों से संयम बरतने और बातचीत के ज़रिए विवाद सुलझाने की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र और क्षेत्रीय संगठनों ने सीमा पर बढ़ती हिंसा को लेकर चिंता व्यक्त की है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर हालात जल्द नियंत्रित नहीं किए गए, तो यह संघर्ष न सिर्फ दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्तों को और बिगाड़ सकता है, बल्कि पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था पर भी असर डाल सकता है।
डूरंड रेखा पर तनाव कोई नया मुद्दा नहीं है। यह सीमा रेखा 1893 में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान खींची गई थी, जिसे अफगानिस्तान की कई सरकारों ने औपचारिक रूप से कभी स्वीकार नहीं किया। यही कारण है कि समय-समय पर इस क्षेत्र में झड़पें होती रही हैं।
हाल की घटनाओं ने एक बार फिर यह दिखाया है कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रिश्ते किस कदर नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि युद्धविराम कितने समय तक कायम रह पाता है और क्या दोनों देश इस संकट को संवाद के ज़रिए हल करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाते हैं।


