मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और वैश्विक आपूर्ति में आई बाधाओं का असर अब भारत की रसोई तक पहुंचने लगा है। कई शहरों में एलपीजी सिलेंडर की कमी की खबरें सामने आ रही हैं। गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें लग रही हैं, जबकि कुछ जगहों पर होटल और रेस्तरां ने गैस की कमी के कारण अपना काम अस्थायी रूप से बंद करना शुरू कर दिया है। ऐसे हालात में लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर भारत पेट्रोल और डीजल की तरह एलपीजी का बड़ा भंडार क्यों नहीं बना पाता।
दरअसल, पेट्रोल और डीजल का उत्पादन कच्चे तेल से होता है और कच्चे तेल को स्टोर करना अपेक्षाकृत आसान होता है। इसे बड़े टैंकों, भूमिगत गड्ढों या पाइपलाइनों में लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। लेकिन एलपीजी यानी लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस को स्टोर करना कहीं अधिक जटिल और महंगा होता है। एलपीजी सामान्य परिस्थितियों में गैस के रूप में होती है, इसलिए इसे तरल रूप में रखने के लिए विशेष दबाव (प्रेशर) की जरूरत होती है। इसके लिए खास तरह के प्रेशराइज्ड टैंक, गोलाकार स्टोरेज टैंक, बुलेट टैंक और भूमिगत गुफाओं जैसी संरचनाओं का निर्माण करना पड़ता है, जिनकी लागत बहुत अधिक होती है।
भारत में फिलहाल एलपीजी के बड़े पैमाने पर भंडारण की सुविधा सीमित है। देश में केवल दो प्रमुख स्थान ऐसे हैं जहां एलपीजी को बड़े स्तर पर सुरक्षित रखने की व्यवस्था है—आंध्र प्रदेश का विशाखापत्तनम और कर्नाटक का मंगलुरु। इन दोनों स्थानों पर जमीन के नीचे विशेष रूप से बनाई गई गुफाओं में गैस का भंडारण किया जाता है। इन्हें तकनीकी भाषा में “रॉक कैवर्न्स” कहा जाता है। इन भूमिगत संरचनाओं को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि गैस को सुरक्षित और नियंत्रित दबाव में लंबे समय तक रखा जा सके।
मंगलुरु में स्थित एलपीजी कैवर्न की भंडारण क्षमता लगभग 80,000 टन है, जबकि विशाखापत्तनम में बने कैवर्न में करीब 60,000 टन गैस स्टोर की जा सकती है। इस तरह कुल मिलाकर भारत के पास लगभग 1.4 लाख टन एलपीजी स्टोर करने की क्षमता है। लेकिन यदि देश की दैनिक खपत के हिसाब से देखा जाए तो यह भंडार बेहद कम है। विशेषज्ञों के अनुसार यह गैस देश की जरूरतों को मुश्किल से दो दिन तक ही पूरा कर सकती है।
इसके अलावा देशभर में इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी कंपनियों के 200 से अधिक एलपीजी बॉटलिंग प्लांट मौजूद हैं। इन प्लांटों में बड़े वर्टिकल और हॉरिजॉन्टल टैंकों में गैस को अस्थायी रूप से रखा जाता है, जिन्हें “बुलेट टैंक” कहा जाता है। हालांकि इन टैंकों में भी सीमित मात्रा में ही गैस स्टोर की जा सकती है। रिफाइनरियों में भी एलपीजी के लिए कुछ स्टोरेज टैंक होते हैं, जहां उत्पादन के बाद गैस को अस्थायी रूप से रखा जाता है। इसके अलावा गैस को ट्रकों, पाइपलाइनों और ट्रांसपोर्ट टैंकों के जरिए बॉटलिंग प्लांट तक पहुंचाया जाता है, जिनमें भी थोड़ी मात्रा में गैस मौजूद रहती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में एलपीजी स्टोरेज के सीमित ढांचे की एक बड़ी वजह यह भी है कि पिछले कई वर्षों से गैस की सप्लाई अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई थी। इसी कारण बड़े स्तर पर गैस भंडारण के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे के निर्माण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। हालांकि अब सरकार भविष्य को ध्यान में रखते हुए नई भूमिगत गुफाएं बनाने की योजना पर काम कर रही है।
बताया जा रहा है कि मंगलुरु में पहले से मौजूद कैवर्न के अलावा अतिरिक्त क्षमता विकसित करने की योजना बनाई जा रही है। इसके साथ ही गुजरात और ओडिशा के तटीय इलाकों में भी नई एलपीजी कैवर्न बनाने के लिए सर्वे किए जा रहे हैं, ताकि आयातित गैस को सुरक्षित रूप से स्टोर किया जा सके। हालांकि इन परियोजनाओं को पूरा होने में समय लगेगा।
मौजूदा हालात ने यह साफ कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से एलपीजी का पर्याप्त भंडार बनाना बेहद जरूरी है। क्योंकि अगर वैश्विक आपूर्ति में थोड़ी भी बाधा आती है, तो उसका सीधा असर आम लोगों की रसोई तक पहुंच सकता है।
Correspondent – Shanwaz Khan


