उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की राजनीति धीरे-धीरे गर्म होने लगी है। चुनाव में अभी समय जरूर है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है। इसी कड़ी में बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की जयंती को लेकर प्रदेश की राजनीति में नया सियासी विवाद खड़ा हो गया है। समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस तीनों दल इस मौके को अपने-अपने तरीके से राजनीतिक रूप देने की तैयारी में हैं।
दरअसल, 15 मार्च को कांशीराम की जयंती मनाई जाती है और इस बार इसे लेकर सपा और बसपा के बीच तीखी बयानबाजी देखने को मिल रही है। वहीं अब कांग्रेस भी इस राजनीतिक समीकरण में सक्रिय होती नजर आ रही है। बताया जा रहा है कि कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इस अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल हो सकते हैं। कांग्रेस की योजना है कि इस दिन को “सामाजिक परिवर्तन दिवस” के रूप में मनाया जाए और इसके जरिए दलित समाज के बीच अपनी पहुंच मजबूत की जाए।
कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि इस कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी दलित समुदाय के बुद्धिजीवियों और शोधार्थियों से संवाद करेंगे। माना जा रहा है कि कांग्रेस इस पहल के जरिए राज्य में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहती है। उत्तर प्रदेश में लंबे समय से कांग्रेस का जनाधार कमजोर रहा है, इसलिए पार्टी नए सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश में लगी है।
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी ने भी कांशीराम जयंती को बड़े स्तर पर मनाने का फैसला किया है। सपा ने इस दिन को “पीडीए दिवस” के रूप में मनाने की घोषणा की है। पीडीए का मतलब है—पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक। समाजवादी पार्टी का मानना है कि इन वर्गों को एकजुट कर ही वह आगामी विधानसभा चुनाव में मजबूत स्थिति बना सकती है।
सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के निर्देश पर पार्टी ने प्रदेश के हर जिला मुख्यालय पर कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई है। पार्टी नेताओं का कहना है कि बहुजन आंदोलन के नेता कांशीराम का सम्मान करना सभी दलों की जिम्मेदारी है और इसी भावना के साथ यह आयोजन किया जा रहा है।
हालांकि समाजवादी पार्टी की इस पहल पर बसपा ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। बसपा नेताओं का आरोप है कि सपा कांशीराम के नाम का राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है। बसपा के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने कहा कि अखिलेश यादव का यह कदम केवल दिखावा है। उनका कहना है कि अगर सपा वास्तव में कांशीराम का सम्मान करती, तो पहले से ही उनके विचारों को महत्व देती।
बसपा का यह भी कहना है कि जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने कांशीराम जयंती पर दी जाने वाली सरकारी छुट्टी को समाप्त कर दिया था। ऐसे में अब उनकी पार्टी द्वारा कांशीराम के नाम पर कार्यक्रम करना केवल राजनीतिक नाटक है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही सपा और कांग्रेस अलग-अलग मंचों से कार्यक्रम करें, लेकिन दोनों का लक्ष्य लगभग एक ही है। दोनों दलों की नजर बसपा और भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक पर है। खास तौर पर दलित और पिछड़े वर्गों को अपने पक्ष में करने की रणनीति पर काम किया जा रहा है।
2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था और इस गठबंधन को कई सामाजिक वर्गों का समर्थन मिला था। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में भी यह गठबंधन बरकरार रह सकता है। सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत चुनाव के करीब आते ही तेज होने की संभावना है।
लोकनीति-सीएसडीएस के आंकड़ों के अनुसार 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के गठबंधन को कई सामाजिक वर्गों का अच्छा समर्थन मिला था। आंकड़ों के मुताबिक यादव समुदाय के लगभग 82 प्रतिशत वोट इस गठबंधन को मिले थे। इसके अलावा कुर्मी-कोइरी समुदाय के करीब 34 प्रतिशत और अन्य पिछड़ी जातियों के लगभग 34 प्रतिशत मतदाताओं ने भी गठबंधन का समर्थन किया था।
दलित समुदाय के भीतर भी गठबंधन को कुछ हद तक समर्थन मिला था। आंकड़ों के अनुसार जाटव समुदाय के लगभग 25 प्रतिशत वोट और गैर-जाटव दलितों के करीब 56 प्रतिशत वोट सपा-कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में गए थे। मुस्लिम समुदाय में तो गठबंधन को भारी समर्थन मिला था, जहां लगभग 92 प्रतिशत वोट उनके पक्ष में पड़े थे।
वहीं अगर बसपा की बात करें तो उसे जाटव समुदाय से अब भी सबसे ज्यादा समर्थन मिलता है। आंकड़ों के अनुसार जाटव समुदाय के करीब 44 प्रतिशत वोट बसपा को मिले थे। हालांकि अन्य जातीय समूहों में पार्टी का प्रभाव अपेक्षाकृत कम दिखाई दिया।
दूसरी ओर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए को भी कई सामाजिक वर्गों का मजबूत समर्थन मिला था। एनडीए को यादव समुदाय के लगभग 15 प्रतिशत वोट, कुर्मी-कोइरी के करीब 61 प्रतिशत और अन्य पिछड़ी जातियों के करीब 59 प्रतिशत वोट मिले थे। इसके अलावा अगड़ी जातियों के लगभग 79 प्रतिशत मतदाताओं ने भी एनडीए का समर्थन किया था।
अगर वोट प्रतिशत के अंतर को देखा जाए तो कई सामाजिक समूहों में दलों के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। उदाहरण के तौर पर यादव वोटों में इंडिया गठबंधन और एनडीए के बीच करीब 67 प्रतिशत का अंतर था। वहीं जाटव वोटों में बसपा और इंडिया गठबंधन के बीच लगभग 19 प्रतिशत का अंतर देखने को मिला।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा और कांग्रेस की कोशिश होगी कि दलित समाज के उस हिस्से में अपनी पकड़ मजबूत करें, जहां अब भी बसपा का प्रभाव बना हुआ है। खासकर जाटव वोट बैंक को लेकर दोनों दलों की रणनीति पर सबकी नजर रहेगी।
इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांशीराम का नाम एक बार फिर केंद्र में आ गया है। सभी राजनीतिक दल उनके विचारों और विरासत के सहारे अपने-अपने वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि 2027 के विधानसभा चुनाव तक राजनीतिक समीकरण किस तरह बदलते हैं। क्या सपा और कांग्रेस का गठबंधन दलित और पिछड़े मतदाताओं को एकजुट करने में सफल होगा, या फिर बसपा अपनी पारंपरिक पकड़ को बनाए रखने में कामयाब रहेगी। आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह मुद्दा और भी ज्यादा महत्वपूर्ण बन सकता है।
Correspondent – Shanwaz Khan


