लोकसभा में सोमवार को ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में विशेष चर्चा आयोजित की गई। इस चर्चा के दौरान समाजवादी पार्टी (सपा) की कैराना से सांसद इकरा हसन का भाषण सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। उन्होंने वंदे मातरम् के शब्दार्थ, उसके भाव और उससे जुड़े राजनीतिक मुद्दों पर विस्तृत दृष्टिकोण रखते हुए सरकार पर कई गंभीर प्रश्न उठाए।
इकरा हसन ने वंदे मातरम् के अर्थ की चर्चा करते हुए कहा कि यह गीत केवल राष्ट्रभक्ति का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रकृति और देश की विविधता का सम्मान करने की भावना से भरा हुआ है। उन्होंने कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि हम इसके वास्तविक संदेश और उससे जुड़े मूल्यों को समझें। उनके अनुसार, वंदे मातरम् भारतीय भूमि, जल, जंगल, हरियाली और निर्मल हवा की वंदना का प्रतीक है, जिसका उद्देश्य देश के हर नागरिक के सुख-समृद्धि की कामना करना है।
सपा सांसद ने यह भी कहा कि वंदे मातरम् को लेकर बार-बार मुस्लिम समुदाय को कठघरे में खड़ा किया जाता है, जबकि इतिहास साक्षी है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस और गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर जैसे राष्ट्रनायकों ने इसके किन छंदों को अपनाया जाए, इस पर विचार कर उचित निर्णय लिया था। उन्होंने पूछा कि क्या अब हम उन महान व्यक्तित्वों की समझ और दूरदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाएंगे?
इकरा हसन ने गीत के विभिन्न पदों की व्याख्या करते हुए देश की वर्तमान परिस्थितियों पर भी ध्यान दिलाया।
उन्होंने ‘सुजलाम सुफलाम’ का अर्थ बताते हुए कहा कि इसका भाव है—ऐसा देश जहां नदियाँ स्वच्छ हों, जीवनदायिनी हों। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। उन्होंने यमुना नदी का उदाहरण देते हुए कहा कि हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार कई स्थानों पर इसका बीओडी स्तर 127 mg/l तक पहुँच चुका है, जबकि किसी जीवित नदी के लिए यह मानक सिर्फ 3 mg/l होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि ‘नमामि गंगे’ जैसे योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन नदियों की स्थिति में वास्तविक सुधार नजर नहीं आता। किसान आज भी जहरीले पानी के सहारे खेती करने को मजबूर हैं, जिससे ‘सुफलाम’ का भाव खोता जा रहा है।
‘मलयज शीतलाम’ की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि इसका तात्पर्य है—मलय पर्वतों से आने वाली शीतल, सुगंधित और जीवनदायिनी हवा। लेकिन देश के बड़े हिस्सों में प्रदूषण इस कदर बढ़ चुका है कि हवा बीमारी देने वाली बन गई है। उन्होंने कहा कि संसद के बाहर निकलकर एक गहरी सांस लीजिए, महसूस होगा कि यह हवा नहीं, फेफड़ों में उतरता जहर है।
इकरा हसन ने कहा कि भारत वह देश है जो प्रकृति की पूजा करता है, लेकिन उसी प्रकृति को बचाने वाले कानूनों को कमजोर किया जा रहा है। जंगलों की कटाई, बढ़ता प्रदूषण और नदियों की बिगड़ती स्थिति बताती है कि ‘सुजलाम-सुफलाम’ और ‘शस्य-श्यामलाम’ जैसी भावनाएँ धुंधली पड़ रही हैं। किसानों की स्थिति पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि आज किसान केवल मौसम से नहीं, बल्कि गलत नीतियों और प्रदूषणजनित समस्याओं से भी जूझ रहा है, जिससे उसकी उपज और आजीविका पर बुरा असर पड़ रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि वंदे मातरम् को राजनीति का आधार बनाया जा रहा है, जबकि जमीन उद्योगपतियों को सौंपी जा रही है और आदिवासी अपने ही घरों से विस्थापित हो रहे हैं। ‘मातरम्’ में मातृभूमि के साथ-साथ देश की हर महिला के सम्मान की बात शामिल है, लेकिन देश में महिलाओं पर बढ़ते अपराध इस भावना के विपरीत हैं।
अंत में इकरा हसन ने कहा कि वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक संदेश है—प्रकृति, मनुष्य और राष्ट्र के सामंजस्य का। इसे राजनीतिक हथियार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और जिम्मेदारी के रूप में समझने की आवश्यकता है।
Correspondent – Shanwaz khan


