नई दिल्ली: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने के लिए विपक्षी दलों ने मंगलवार (10 फरवरी 2026) को सदन के महासचिव को नोटिस सौंपा है। इस नोटिस पर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके समेत कई दलों के लगभग 120 सांसदों के हस्ताक्षर बताए जा रहे हैं। हालांकि तृणमूल कांग्रेस के 28 सांसदों ने अब तक इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। इस घटनाक्रम के बाद एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि क्या लोकसभा के किसी स्पीकर को कभी हटाया गया है और अब तक ऐसे प्रस्ताव कितनी बार लाए गए हैं?
क्या कभी हटाया गया लोकसभा अध्यक्ष?
भारतीय संसदीय इतिहास में अब तक किसी भी लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाने का प्रस्ताव पारित नहीं हुआ है। हालांकि अलग-अलग समय पर स्पीकर के खिलाफ अविश्वास या पद से हटाने के प्रस्ताव जरूर लाए गए, लेकिन कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सका।
इतिहास में तीन प्रमुख मामले दर्ज हैं, जब स्पीकर के खिलाफ औपचारिक प्रस्ताव पेश किए गए:
- 1954 – जी. वी. मावलंकर के खिलाफ प्रस्ताव
स्वतंत्र भारत के पहले लोकसभा अध्यक्ष जी. वी. मावलंकर के खिलाफ 1954 में समाजवादी नेता विग्नेश्वर मिश्रा ने प्रस्ताव पेश किया था। हालांकि इसे सदन में पर्याप्त समर्थन नहीं मिला और प्रस्ताव खारिज कर दिया गया। - 1966 – सरदार हुकुम सिंह के खिलाफ प्रस्ताव
1966 में तत्कालीन स्पीकर सरदार हुकुम सिंह के खिलाफ समाजवादी नेता मधु लिमये ने प्रस्ताव पेश किया। इस पर चर्चा भी हुई, लेकिन मतदान के दौरान इसे बहुमत नहीं मिला और प्रस्ताव गिर गया। - 1987 – बलराम जाखड़ के खिलाफ प्रस्ताव
1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ प्रस्ताव लाया गया, जिसे सोमनाथ चटर्जी ने पेश किया था। यह मामला भी काफी चर्चा में रहा, लेकिन आवश्यक बहुमत नहीं मिलने के कारण प्रस्ताव पारित नहीं हो सका।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि अब तक कोई भी स्पीकर पद से हटाया नहीं गया है।
क्या कहता है संविधान?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94 के तहत लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया का प्रावधान है। इसके अनुसार, स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम 50 सांसदों का समर्थन आवश्यक होता है। नोटिस लोकसभा महासचिव को दिया जाता है।
इसके बाद प्रस्ताव को सदन में सूचीबद्ध किया जाता है, जिस पर चर्चा और फिर मतदान होता है। स्पीकर को हटाने के लिए सदन के कुल सदस्यों के बहुमत की आवश्यकता होती है, यानी केवल उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का नहीं, बल्कि पूरी लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के आधार पर बहुमत जरूरी होता है।
अध्यक्ष का बचाव करने का अधिकार
लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचारी के अनुसार, परंपरा के मुताबिक बहुमत की गणना करते समय सदन के सभी सदस्यों की संख्या को ध्यान में रखा जाता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नोटिस महासचिव को ही सौंपा जाता है, न कि उपाध्यक्ष या किसी अन्य अधिकारी को।
संविधान के अनुच्छेद 96 के तहत, जब स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव विचाराधीन होता है, तो वे सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते। हालांकि उन्हें अपना पक्ष रखने और बचाव करने का पूरा अधिकार है। प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान पीठासीन सभापति कार्यवाही संचालित करते हैं।
मौजूदा नोटिस पर क्या होगा आगे?
सूत्रों के अनुसार, विपक्ष द्वारा दिए गए नोटिस की पहले जांच की जाएगी कि वह नियमों के अनुरूप है या नहीं और उसमें विशिष्ट आरोप शामिल हैं या नहीं। आरोपों का स्पष्ट उल्लेख आवश्यक होता है, ताकि संबंधित अध्यक्ष अपना जवाब दे सकें।
यदि नोटिस नियमों के अनुरूप पाया जाता है, तो उसे सदन में विचार के लिए लाया जाएगा। हालांकि इतिहास गवाह है कि अब तक ऐसा कोई प्रस्ताव पारित नहीं हुआ है।
इस तरह, लोकसभा अध्यक्ष को हटाने का प्रावधान संविधान में जरूर है, लेकिन व्यवहार में यह बेहद दुर्लभ और कठिन प्रक्रिया साबित हुई है। अब देखना होगा कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में यह प्रस्ताव किस दिशा में आगे बढ़ता है।
Correspondent – Shanwaz Khan


