भारत का संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि देश के लोकतंत्र, समानता और न्याय की मूल आधारशिला है। इसकी रचना 1946 में गठित संविधान सभा ने की थी, जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से प्रतिनिधियों को शामिल किया गया था। देश के विभाजन के बाद संविधान सभा में कुल 299 सदस्य रह गए थे, जिनमें 15 महिलाएं भी शामिल थीं। उस दौर में जब महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में भागीदारी बेहद सीमित थी और सामाजिक बंधन काफी मजबूत थे, तब इन महिलाओं ने न केवल रूढ़ियों को चुनौती दी, बल्कि देश के भविष्य को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इन महिला सदस्यों ने संविधान निर्माण की प्रक्रिया के दौरान शिक्षा, समान अधिकार, महिला सशक्तिकरण, सामाजिक न्याय, स्वास्थ्य, श्रमिक अधिकार और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर खुलकर अपनी आवाज उठाई। उन्होंने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि स्वतंत्र भारत का संविधान हर नागरिक को समान अवसर और अधिकार प्रदान करे।
अम्मू स्वामीनाथन उन प्रमुख महिला सदस्यों में से थीं, जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों की मजबूती से वकालत की। उनका मानना था कि नया संविधान यह साबित करेगा कि महिलाएं किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं हैं। उन्होंने लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।
सरोजिनी नायडू, जिन्हें ‘भारत कोकिला’ के नाम से जाना जाता है, महिलाओं की शिक्षा और राजनीतिक भागीदारी की प्रबल समर्थक थीं। उन्होंने महिलाओं को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया और समाज में उनकी भागीदारी को बढ़ावा देने की वकालत की।
बेगम ऐजाज रसूल संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य थीं। उन्होंने धर्मनिरपेक्ष भारत की अवधारणा का समर्थन किया और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा तथा समान अधिकारों पर विशेष जोर दिया। उनके विचारों ने संविधान को समावेशी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
हंसा मेहता ने संविधान में लैंगिक समानता सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाई। वे महिला अधिकारों और शिक्षा की प्रबल पक्षधर थीं और उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं को भी समान नागरिक अधिकार मिलें। उनकी सोच ने समानता के सिद्धांत को मजबूत आधार दिया।
सुचेता कृपलानी भी संविधान सभा की प्रभावशाली सदस्य थीं, जिन्होंने महिलाओं की शिक्षा, श्रमिकों के अधिकार और सामाजिक कल्याण जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। आगे चलकर वे उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, जो उनके नेतृत्व और दृष्टि का प्रमाण है।
दुर्गाबाई देशमुख ने समाज सुधार, महिला शिक्षा और कल्याण योजनाओं के महत्व को संविधान निर्माण के दौरान रेखांकित किया। उन्होंने सामाजिक न्याय और शिक्षा के प्रसार को राष्ट्र निर्माण का आधार माना। इसी तरह विजयलक्ष्मी पंडित ने अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण और महिलाओं की स्थिति को लेकर महत्वपूर्ण विचार रखे और बाद में वैश्विक मंचों पर भी भारत का प्रतिनिधित्व किया।
राजकुमारी अमृत कौर ने स्वास्थ्य सेवाओं और महिला अधिकारों को लेकर अहम सुझाव दिए। स्वतंत्र भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री के रूप में उन्होंने देश की आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एनी मस्कारेन ने सामाजिक समानता और श्रमिकों के अधिकारों की मजबूती से पैरवी की।
रेणुका रे ने महिलाओं की कानूनी और आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने की दिशा में अपने विचार रखे। उन्होंने सामाजिक न्याय और महिला सशक्तिकरण को संविधान की मूल भावना से जोड़ने का प्रयास किया। पूर्णिमा बनर्जी ने गरीबों और महिलाओं के लिए समान अवसर और न्याय की मांग को मजबूती से उठाया।
लीला रॉय ने महिला शिक्षा और समाज सुधार के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया, जबकि मालती चौधरी ने ग्रामीण विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों को संविधान निर्माण के दौरान प्रमुखता से रखा। वहीं दक्षायनी वेलायुधन संविधान सभा की पहली दलित महिला सदस्य थीं, जिन्होंने छुआछूत और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ सशक्त आवाज उठाई और वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा की मांग की।
इन सभी महिला सदस्यों का योगदान इस बात का प्रमाण है कि भारतीय संविधान की आत्मा में समानता, न्याय और समावेशिता की भावना गहराई से निहित है। सामाजिक चुनौतियों और सीमाओं के बावजूद इन महिलाओं ने साहस, दूरदर्शिता और प्रतिबद्धता के साथ संविधान निर्माण में भाग लिया। आज जब हम समान अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करते हैं, तब इन महिला सदस्यों के योगदान को याद करना न केवल जरूरी है, बल्कि प्रेरणादायक भी है, क्योंकि उन्होंने एक ऐसे भारत की कल्पना को आकार दिया जो सभी के लिए समान अवसर और सम्मान सुनिश्चित करता है।
Correspondent – Shanwaz Khan


