नई दिल्ली: गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा की इच्छामृत्यु से जुड़ा मामला बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बेहद भावुक माहौल में बदल गया। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने हरीश राणा के परिवार की ओर से दायर पैसिव इच्छामृत्यु की याचिका को मंजूरी दे दी। सुनवाई के दौरान जस्टिस जे.बी. पारदीवाला इतने भावुक हो गए कि उनकी आंखें नम हो गईं।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि यह फैसला देना आसान नहीं था, लेकिन अदालत को परिस्थितियों को देखते हुए मानवीय दृष्टिकोण अपनाना पड़ा। जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि यह बेहद दुखद स्थिति है और अदालत ऐसे व्यक्ति को अनंत पीड़ा में नहीं देख सकती। उन्होंने कहा कि अब हम उस स्थिति में पहुंच चुके हैं जहां अंतिम फैसला लेना जरूरी हो गया है।
हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से बिस्तर पर पड़े हैं। वर्ष 2013 में जब वह पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे थे, तब हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के कारण उनके सिर में गंभीर चोट लगी थी। इस दुर्घटना में उनके मस्तिष्क को भारी नुकसान पहुंचा और तब से उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। दुर्घटना के बाद से वह पूरी तरह बिस्तर पर हैं और सामान्य जीवन जीने में असमर्थ हैं।
लगातार लंबे समय तक बिस्तर पर रहने के कारण उनके शरीर पर कई घाव भी हो चुके हैं। उन्हें सांस लेने के लिए ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब का सहारा लेना पड़ता है और भोजन गैस्ट्रोस्टॉमी ट्यूब के जरिए दिया जाता है। उनकी रोजमर्रा की देखभाल पूरी तरह चिकित्सा सहायता पर निर्भर है।
हरीश के परिवार ने उनकी स्थिति को देखते हुए अदालत से पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी थी। परिवार का कहना था कि इतने वर्षों से हरीश लगातार असहनीय स्थिति में जी रहे हैं और उनकी हालत में सुधार की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही। इसी आधार पर उन्होंने अदालत से जीवनरक्षक उपकरण हटाने की अनुमति देने की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में हरीश के परिवार की सराहना भी की। अदालत ने कहा कि परिवार ने इतने वर्षों तक हरीश का साथ नहीं छोड़ा और उनकी पूरी निष्ठा के साथ देखभाल की। कोर्ट ने कहा कि किसी से सच्चा प्रेम करने का अर्थ है कि कठिन से कठिन समय में भी उसका साथ न छोड़ा जाए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में मुख्य सवाल यह नहीं है कि मृत्यु मरीज के लिए बेहतर विकल्प है या नहीं, बल्कि यह देखना जरूरी है कि क्या किसी व्यक्ति को लंबे समय तक जीवनरक्षक चिकित्सा उपकरणों के सहारे जिंदा रखना उसके हित में है।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि हरीश राणा को एम्स के पैलिएटिव केयर विभाग में भर्ती किया जाएगा। वहां चिकित्सकीय निगरानी में उनके जीवनरक्षक उपकरणों को धीरे-धीरे हटाने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। अदालत ने यह भी कहा कि पूरी प्रक्रिया को गरिमा और मानवीय संवेदनशीलता के साथ संपन्न किया जाना चाहिए।
इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने हरीश राणा के परिवार की याचिका को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट का कहना था कि भारतीय कानून के तहत सक्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं है। इसके बाद अगस्त 2024 में परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां केंद्र सरकार से भी इस मामले में मानवीय समाधान तलाशने के लिए कहा गया था।
अब सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद हरीश राणा के मामले में लंबे समय से चल रही कानूनी प्रक्रिया का एक संवेदनशील अंत सामने आया है।
Correspondent – Shanwaz Khan


