महाराष्ट्र की राजनीति में भिवंडी महानगरपालिका से एक अनोखा राजनीतिक समीकरण सामने आया है, जहां परंपरागत रूप से एक-दूसरे के विरोधी माने जाने वाले कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) मेयर पद के चुनाव में एक साथ नजर आए हैं। इस अप्रत्याशित गठजोड़ ने स्थानीय राजनीति में हलचल मचा दी है और इसे एकनाथ शिंदे गुट के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
दरअसल, भिवंडी-निजामपुर महानगरपालिका में मेयर पद के लिए बीजेपी की उम्मीदवार स्नेहा पाटील को कांग्रेस ने समर्थन देने का फैसला किया है। कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर पत्र जारी कर अपने समर्थन की घोषणा की, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि स्थानीय सत्ता समीकरण में नई रणनीति के तहत दोनों दल एक साथ आए हैं। आमतौर पर राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे के खिलाफ राजनीति करने वाली इन पार्टियों का इस तरह साथ आना राजनीतिक रूप से काफी चौंकाने वाला कदम माना जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, पहले बीजेपी की ओर से नारायण चौधरी का नाम मेयर पद के लिए आगे किया गया था, लेकिन बाद में पार्टी ने रणनीति बदलते हुए स्नेहा पाटील को उम्मीदवार बनाया। इसके बाद कांग्रेस ने उन्हें समर्थन देने का निर्णय लिया। बीजेपी का कहना है कि वह स्थानीय स्तर पर एक ऐसे उम्मीदवार को आगे लाना चाहती है, जो सभी वर्गों को साथ लेकर चल सके और नगर की प्रशासनिक व्यवस्था को संतुलित तरीके से संचालित कर सके।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या यह कदम शिवसेना के शिंदे गुट को सत्ता से दूर रखने की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। गौरतलब है कि राज्य की सत्ता में बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना सहयोगी दल के रूप में साथ हैं, लेकिन स्थानीय निकाय चुनावों में समीकरण अक्सर अलग दिखाई देते हैं। भिवंडी की राजनीति में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है, जहां स्थानीय हित और सत्ता संतुलन को ध्यान में रखते हुए नए गठबंधन बनते दिख रहे हैं।
भिवंडी महानगरपालिका चुनाव के परिणाम भी इस सियासी बदलाव की एक बड़ी वजह माने जा रहे हैं। चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था, जिससे मेयर पद के लिए जोड़-तोड़ की राजनीति तेज हो गई। नतीजों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उसे 30 सीटें मिलीं, जबकि बीजेपी को 22 सीटों पर जीत हासिल हुई। इसके अलावा, एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना और शरद पवार गुट की एनसीपी-एसपी को 12-12 सीटें मिलीं। समाजवादी पार्टी ने 6 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि अन्य छोटे दलों और गठबंधनों ने भी कुछ सीटें हासिल कीं। एक निर्दलीय उम्मीदवार भी विजयी रहा।
स्पष्ट बहुमत के अभाव में मेयर पद के लिए समर्थन जुटाना सभी दलों के लिए चुनौती बन गया था। ऐसे में कांग्रेस द्वारा बीजेपी उम्मीदवार को समर्थन देने से सत्ता समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम स्थानीय स्तर पर व्यावहारिक राजनीति का उदाहरण है, जहां विचारधारा से अधिक महत्व सत्ता संतुलन और प्रशासनिक नियंत्रण को दिया जाता है।
इस घटनाक्रम ने महाराष्ट्र की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है कि क्या भविष्य में स्थानीय चुनावों में इस तरह के अप्रत्याशित गठबंधन और अधिक देखने को मिल सकते हैं। फिलहाल, भिवंडी में कांग्रेस और बीजेपी की यह साझेदारी नगर राजनीति का सबसे बड़ा चर्चा का विषय बन चुकी है और इसके दूरगामी राजनीतिक प्रभावों पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
Correspondent – Shanwaz Khan


