इस्लामाबाद: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग़ज़ा शांति योजना को समर्थन देने के बाद पाकिस्तान की सियासत में हलचल मच गई है। प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ के इस फैसले की आलोचना न सिर्फ विपक्ष बल्कि देश के पूर्व राजनयिक भी कर रहे हैं।
ट्रंप की योजना पर पाकिस्तान की सफाई
विदेश मंत्री और उपप्रधानमंत्री इसहाक़ डार ने कहा है कि ट्रंप की ओर से जारी किए गए 20 पॉइंट्स असली ड्राफ्ट से अलग हैं।
उन्होंने कहा, “ट्रंप ने जो पॉइंट्स सार्वजनिक किए हैं, वे उन बिंदुओं से मेल नहीं खाते जो मुस्लिम देशों के साथ साझा किए गए थे।”
हालांकि, प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने ट्रंप के पॉइंट्स सार्वजनिक होने से पहले ही योजना का समर्थन कर दिया था और अमेरिकी राष्ट्रपति की सराहना की थी।
पाकिस्तान में विरोध बढ़ा
पूर्व राजदूत मलीहा लोधी ने कहा कि ट्रंप की योजना इसराइल के हितों की रक्षा करती है और इसमें फ़लस्तीन के अधिकारों के लिए कोई ठोस प्रतिबद्धता नहीं है।
उन्होंने कहा, “पाकिस्तान में इस पर प्रतिक्रिया नकारात्मक है। यह हमारी पारंपरिक विदेश नीति के खिलाफ है।”
सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्टेबलाइज़ेशन फोर्स (ISF) में अपनी सेना भेजेगा, जो ग़ज़ा में सुरक्षा संभालेगी।
धार्मिक दलों का विरोध
जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख हाफ़िज़ नईमुर रहमान ने चेतावनी दी है कि “अगर सरकार इसराइल को मान्यता देने की दिशा में एक कदम भी बढ़ाती है, तो हर स्तर पर विरोध होगा।”
वहीं, जेयूआई (एफ) प्रमुख मौलाना फ़ज़लुर रहमान ने ट्रंप की योजना को “इसराइल के विस्तार का फॉर्मूला” बताया।
पीटीआई ने भी इस योजना को खारिज करते हुए कहा कि “यरूशलम को इसराइल की राजधानी मानना अंतरराष्ट्रीय कानून और यूएन प्रस्तावों का उल्लंघन है।”
ट्रंप को खुश करने की कोशिश?
विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान की मौजूदा सरकार ट्रंप को खुश करने के लिए ऐसे कदम उठा रही है जो घरेलू राजनीति में भारी पड़ सकते हैं।
रक्षा विशेषज्ञ आयशा सिद्दीका ने कहा, “पाकिस्तान के लोग फ़लस्तीन के मुद्दे पर बेहद संवेदनशील हैं। सरकार का कोई भी झुकाव इसराइल की तरफ़ गया तो राजनीतिक संकट खड़ा हो सकता है।”
पाकिस्तान की दुविधा
इसराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने पाकिस्तान को एक मुश्किल स्थिति में ला खड़ा किया है। पश्चिमी देश चाहते हैं कि पाकिस्तान ईरान से दूरी बनाए रखे, जबकि ईरान चाहता है कि पाकिस्तान उसका साथ दे।
पाकिस्तान ने अब तक इसराइल को औपचारिक मान्यता नहीं दी है। इसका तर्क यह है कि जब तक फ़लस्तीन को उसका अधिकार नहीं मिलता, तब तक इसराइल को मान्यता नहीं दी जाएगी — यह वही रुख़ है जो मोहम्मद अली जिन्ना ने 1948 में अपनाया था।
निष्कर्ष
पाकिस्तान के लिए ट्रंप की ग़ज़ा शांति योजना एक राजनयिक दुविधा बन गई है —
एक ओर अमेरिका से संबंध सुधारने की कोशिश है, तो दूसरी ओर घरेलू दबाव और धार्मिक भावनाएँ उसे पीछे खींच रही हैं।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस नाज़ुक संतुलन में पाकिस्तान अपनी विदेश नीति को किस दिशा में मोड़ता है।


