पाकिस्तान US ईरान वार्ता मेजबानी के तहत वैश्विक कूटनीति में एक अहम पहल सामने आई है। शहबाज शरीफ के नेतृत्व में आयोजित इस वार्ता ने अमेरिका और ईरान के बीच संवाद को नई दिशा दी है। इससे न केवल लंबे समय से अटके परमाणु समझौते के पुनरुद्धार की उम्मीद बढ़ी है, बल्कि मध्य पूर्व में स्थिरता और शांति की संभावनाएं भी मजबूत हुई हैं। पाकिस्तान की यह भूमिका अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता को दर्शाती है।
इस्लामाबाद: अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के क्षितिज पर एक नया सूर्योदय होते हुए दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ऐलान किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से ठप्प पड़ी वार्ता अब पाकिस्तानी मिट्टी पर फलित होगी। शहबाज ने इसे “पूरे मुस्लिम दुनिया के लिए गर्व का क्षण” करार दिया है। यह घोषणा न केवल पाकिस्तान की कूटनीतिक क्षमता को रेखांकित करती है, बल्कि मध्य पूर्व की जटिल भू-राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ती है।
पाकिस्तान, जो हमेशा से क्षेत्रीय शांति का पैरोकार रहा है, अब वैश्विक मंच पर मध्यस्थ की भूमिका निभाने को तैयार है। शहबाज शरीफ ने संसद में कहा, “यह हमारे लिए सम्मान की बात है कि अमेरिका और ईरान ने हमें वार्ता की मेजबानी का मौका दिया। यह मुस्लिम ummah के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।” उनकी यह टिप्पणी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है, जहां लाखों यूजर्स इसे पाकिस्तान की कूटनीतिक जीत बता रहे हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर पाकिस्तान को यह जिम्मेदारी क्यों मिली?
दरअसल, पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति इसे आदर्श मेजबान बनाती है। ईरान का पड़ोसी होने के साथ-साथ, पाकिस्तान अमेरिका का पुराना सहयोगी रहा है। अफगानिस्तान संकट के दौरान पाकिस्तान ने अमेरिका की मदद की थी, जबकि ईरान के साथ उसके सांस्कृतिक और धार्मिक रिश्ते गहरे हैं। हाल के वर्षों में, पाकिस्तान ने तुर्की और सऊदी अरब के साथ मिलकर क्षेत्रीय शांति के प्रयास तेज किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वार्ता न्यूक्लियर डील के पुनरुद्धार और तनाव कम करने का रास्ता खोल सकती है।
याद कीजिए 2015 की JCPOA (संयुक्त व्यापक कार्य योजना) जो ओबामा प्रशासन में हुई थी। ट्रंप के आने के बाद यह समझौता टूट गया, जिससे ईरान ने यूरेनियम संवर्धन तेज कर दिया। बाइडेन प्रशासन अब इसे पुनर्जनन देना चाहता है। पाकिस्तान की मेजबानी में होने वाली यह वार्ता तेहरान और वाशिंगटन के बीच विश्वास बहाली का पहला कदम हो सकती है। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बताया कि वार्ता इस्लामाबाद में ही होगी, जिसमें दोनों पक्षों के उच्च अधिकारी शामिल होंगे। तारीखों का ऐलान जल्द ही होगा।
इस बीच, क्षेत्रीय शक्तियां सतर्क हैं। सऊदी अरब और इजरायल ईरान के न्यूक्लियर कार्यक्रम से चिंतित हैं। पाकिस्तान ने स्पष्ट किया है कि वार्ता शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए होगी। शहबाज शरीफ ने कहा, “हम शांति के दूत हैं, न कि किसी पक्ष के समर्थक।” पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था के लिए भी यह फायदेमंद है। सफल वार्ता से व्यापारिक रास्ते खुलेंगे, खासकर ग्वादर बंदरगाह के जरिए। CPEC प्रोजेक्ट को बल मिलेगा।
विपक्षी दलों ने भी स्वागत किया है। PTI नेता ने ट्वीट किया, “राष्ट्रीय हित में यह सकारात्मक कदम है।” लेकिन कुछ आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि क्या पाकिस्तान अमेरिकी दबाव में है? विशेषज्ञ डॉ. मलिक ने कहा, “यह पाकिस्तान की सॉफ्ट पावर का प्रदर्शन है। हम लंबे समय से तटस्थ मध्यस्थ बने हुए हैं।”
मुस्लिम दुनिया में यह खबर उत्साह ला रही है। तुर्की, मलेशिया और इंडोनेशिया के नेता बधाई दे रहे हैं। ईरानी राष्ट्रपति ने पाकिस्तान का धन्यवाद किया, जबकि अमेरिकी विदेश विभाग ने “रचनात्मक कदम” बताया। यदि यह वार्ता सफल हुई, तो मध्य पूर्व में नया युग शुरू हो सकता है। तेल कीमतें स्थिर होंगी, आतंकवाद पर अंकुश लगेगा।
पाकिस्तान के लिए यह अवसर है अपनी छवि मजबूत करने का। शहबाज शरीफ सरकार, जो आर्थिक संकट से जूझ रही है, को कूटनीतिक सफलता की जरूरत थी। क्या यह वार्ता इतिहास रचेगी? समय बताएगा। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें इस्लामाबाद पर टिकी हैं। मुस्लिम जगत का गौरव बढ़ाने वाला यह क्षण पाकिस्तान को वैश्विक पटल पर नई ऊंचाइयों पर ले जा सकता है।
Correspondent – Shanwaz Khan


