भोजशाला विवाद में हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष ने कहा नमाज पढ़ने से मस्जिद नहीं बनती। ASI रिपोर्ट और ऐतिहासिक साक्ष्यों पर बहस जारी।
मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद एक बार फिर चर्चा में है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में इस मामले की सुनवाई जारी है, जहां हिंदू और मुस्लिम पक्ष अपने-अपने दावे पेश कर रहे हैं।
मंगलवार (7 अप्रैल 2026) को हुई सुनवाई में हिंदू पक्ष ने जोरदार दलील देते हुए कहा कि किसी स्थान पर केवल नमाज पढ़ लेने से वह स्थान कानूनी रूप से मस्जिद नहीं बन जाता। इस बयान ने पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील और चर्चा का विषय बना दिया है।
विवाद की जड़ क्या है?
भोजशाला परिसर को लेकर वर्षों से विवाद चला आ रहा है। हिंदू समुदाय इसे वाग्देवी यानी मां सरस्वती का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है।
यह पूरा परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है। वर्तमान में यहां एक विशेष व्यवस्था लागू है, जिसके तहत हिंदुओं को मंगलवार को पूजा करने और मुस्लिमों को शुक्रवार को नमाज अदा करने की अनुमति दी गई है।
हिंदू पक्ष की मुख्य दलील
सुनवाई के दौरान ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ की ओर से वरिष्ठ वकील विष्णु शंकर जैन ने अदालत में अपनी दलीलें पेश कीं।
उन्होंने कहा कि यह स्थल मूल रूप से 11वीं सदी में परमार वंश के राजा भोज द्वारा स्थापित सरस्वती मंदिर था। ऐतिहासिक और राजस्व रिकॉर्ड में भी इसे ‘भोजशाला’ के नाम से ही जाना जाता है।
वकील ने दावा किया कि मंदिर को तोड़कर उसके अवशेषों से एक विवादित ढांचा खड़ा किया गया, जिसे बाद में नमाज के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस्लामी कानून के अनुसार किसी स्थान को मस्जिद बनने के लिए उसे विधिवत वक्फ संपत्ति घोषित करना आवश्यक होता है, जो इस मामले में नहीं हुआ।
ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य
हिंदू पक्ष ने अपनी दलील के समर्थन में कई ऐतिहासिक दस्तावेज, विदेशी और देशी लेखकों की किताबें, तथा ASI और पुरातत्व विभाग के प्रकाशनों का हवाला दिया।
दलील में कहा गया कि भोजशाला को 1909 से पहले ही संरक्षित स्मारक का दर्जा मिल चुका था और यह वक्फ संपत्ति नहीं है।
इसके अलावा, हिंदू धर्मशास्त्रों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि एक बार किसी मंदिर में मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा हो जाए, तो वह स्थान हमेशा मंदिर ही रहता है, चाहे संरचना को नुकसान क्यों न पहुंचाया गया हो।
मुस्लिम पक्ष का विरोध
दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष ने ASI की रिपोर्ट और हिंदू पक्ष के दावों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यह स्थल कमाल मौला मस्जिद है और वहां लंबे समय से नमाज अदा की जाती रही है।
उन्होंने आरोप लगाया कि ASI ने अपने सर्वेक्षण में कुछ ऐसे तत्वों को भी शामिल किया, जो पहले से मौजूद नहीं थे या जिन्हें बाद में जोड़ा गया।
मुस्लिम पक्ष का मानना है कि इस मामले में निष्पक्ष जांच और संतुलित दृष्टिकोण जरूरी है।
ASI की रिपोर्ट और विवाद
ASI ने हाई कोर्ट के आदेश पर इस परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था और 2000 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।
इस रिपोर्ट में संकेत दिया गया कि यहां एक प्राचीन संरचना मौजूद थी, जो मस्जिद से पहले की हो सकती है। साथ ही यह भी कहा गया कि वर्तमान ढांचे में मंदिर के अवशेषों का पुन: उपयोग किया गया है।
हालांकि, इस रिपोर्ट को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने हुए हैं।
आगे क्या होगा?
हाई कोर्ट की इंदौर बेंच इस मामले में नियमित सुनवाई कर रही है। आने वाले दिनों में दोनों पक्षों की दलीलों और साक्ष्यों के आधार पर अदालत अपना फैसला सुनाएगी।
यह मामला न केवल धार्मिक बल्कि ऐतिहासिक और कानूनी दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
निष्कर्ष
भोजशाला विवाद भारत के उन जटिल मामलों में से एक है, जहां इतिहास, धर्म और कानून आपस में जुड़े हुए हैं। अदालत का अंतिम फैसला इस विवाद को एक नई दिशा देगा और यह तय करेगा कि इस ऐतिहासिक स्थल का वास्तविक स्वरूप क्या है।
Correspondent – Shanwaz Khan


