नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने संगठन की नींव को फिर एक बार स्पष्ट करते हुए कहा कि ‘आरएसएस में किसी भी जाति, वर्ग या पृष्ठभूमि का व्यक्ति सरसंघचालक बन सकता है।’ यह बयान जातिगत आरक्षण और हिंदू एकता की बहस के बीच आया, जहां भागवत ने जोर देकर कहा कि संघ राष्ट्र सेवा को सर्वोपरि मानता है, न कि जाति को। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर राष्ट्र निर्माण में योगदान दें।
भागवत शनिवार को नागपुर में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान बोल रहे थे। उन्होंने कहा, ‘संघ का मूल मंत्र है—राष्ट्र प्रथम। सरसंघचालक का पद योग्यता और सेवा भाव पर आधारित है। चाहे कोई ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो, वैश्य हो या शूद्र—सभी बराबर। हमारा इतिहास गवाह है कि संघ ने हमेशा सर्वसमावेशी दृष्टिकोण अपनाया।’ यह बयान हालिया जातिगत जनगणना और आरक्षण विवादों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जहां विपक्ष संघ पर ऊंची जातियों का गढ़ होने का आरोप लगाता रहा है।
आरएसएस की परंपरा और वर्तमान संदर्भ
आरएसएस की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी, जो ब्राह्मण थे। बाद के सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर, बालासाहेब देवरस और राजेंद्र सिंह भी इसी पृष्ठभूमि से थे। लेकिन भागवत ने स्पष्ट किया कि पद चयन सेवा और नेतृत्व क्षमता पर होता है। ‘संघ में लाखों स्वयंसेवक हैं, सभी जातियों से। हम हिंदू समाज को एकजुट करने के लिए कार्यरत हैं, विभाजन के लिए नहीं।’ उन्होंने आरक्षण नीति का समर्थन किया, लेकिन कहा कि यह स्थायी समाधान नहीं—शिक्षा और आर्थिक उत्थान जरूरी हैं।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज
भागवत के बयान का बीजेपी ने स्वागत किया। केंद्रीय मंत्री ने कहा, ‘संघ राष्ट्रवादी संगठन है, जातिवाद से कोसों दूर।’ वहीं, कांग्रेस ने तंज कसा—’कहने को तो सब कुछ कहते हैं, लेकिन व्यवहार अलग।’ आरजेडी नेता तेजस्वी यादव बोले, ‘अब जाकर बताएं कि बिहार में क्या हो रहा है।’ यह बयान 2026 चुनावों से पहले आया, जब जाति आधारित राजनीति चरम पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे संघ की छवि मजबूत होगी।
भागवत ने समापन में कहा, ‘जाति हमारा गौरव है, लेकिन राष्ट्र हमारा धर्म।’ क्या यह बयान सामाजिक एकता को बढ़ावा देगा? राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।
Nagpur – Piyush Dhar Diwedi


