भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव को लेकर आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है। तय कार्यक्रम के अनुसार 19 जनवरी को नामांकन प्रक्रिया पूरी होगी और 20 जनवरी को नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाम की औपचारिक घोषणा की जाएगी। इसी दिन नितिन नबीन बीजेपी मुख्यालय में पदभार ग्रहण करेंगे। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, जेपी नड्डा, राजनाथ सिंह सहित पार्टी के कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहेंगे। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना कैसे जाता है और इसमें चुनाव आयोग की क्या भूमिका होती है।
क्या चुनाव आयोग का कोई दखल होता है?
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव पूरी तरह पार्टी के आंतरिक संविधान के तहत होता है। इसमें भारत के चुनाव आयोग की कोई सीधी भूमिका नहीं होती। चुनाव आयोग सिर्फ लोकसभा, विधानसभा और अन्य संवैधानिक चुनावों की निगरानी करता है। राजनीतिक दलों के अंदरूनी संगठनात्मक चुनाव उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। इसलिए राष्ट्रीय अध्यक्ष का चयन पार्टी खुद अपने नियमों के अनुसार करती है।
कौन बन सकता है राष्ट्रीय अध्यक्ष?
बीजेपी के संविधान के मुताबिक राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के लिए व्यक्ति का कम से कम 15 वर्षों से पार्टी का प्राथमिक सदस्य होना अनिवार्य है। इसके साथ ही उसे चार कार्यकाल तक सक्रिय सदस्य के रूप में काम करना जरूरी होता है। सक्रिय सदस्य वही माना जाता है, जो लगातार संगठनात्मक गतिविधियों में भाग लेता रहा हो। हालांकि कुछ खास परिस्थितियों में अपवाद संभव हैं, लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद के लिए नियमों को काफी सख्ती से लागू किया जाता है।
नीचे से ऊपर तक होती है चुनाव प्रक्रिया
बीजेपी में संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया जमीनी स्तर से शुरू होती है। पहले प्राथमिक समितियों का गठन होता है, फिर मंडल, जिला और उसके बाद प्रदेश स्तर पर संगठन तैयार किया जाता है। प्रदेश स्तर पर बना निर्वाचन मंडल प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव करता है। इस मंडल में उस राज्य की विधानसभा सीटों के बराबर सदस्य होते हैं, जिनमें महिलाओं और आरक्षित वर्गों का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया जाता है।
राष्ट्रीय परिषद की भूमिका
प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव के साथ ही राष्ट्रीय परिषद का गठन होता है। यही राष्ट्रीय परिषद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव करती है। इसमें देश की लोकसभा सीटों के बराबर सदस्य शामिल होते हैं। यदि किसी स्तर पर महिला या आरक्षित वर्ग का प्रतिनिधित्व कम रह जाता है, तो बाद में समायोजन किया जाता है। कम से कम 50 प्रतिशत राज्यों में संगठनात्मक चुनाव पूरे होने के बाद ही राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया शुरू होती है।
नामांकन और सर्वसम्मति की परंपरा
राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के उम्मीदवार का नाम कम से कम पांच राज्यों की राष्ट्रीय परिषद इकाइयों से प्रस्तावित होना जरूरी होता है। इसके बाद उम्मीदवार की लिखित सहमति ली जाती है। बीजेपी में आमतौर पर सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुनने की परंपरा रही है, जिससे मुकाबले की स्थिति कम ही बनती है और चुनाव औपचारिक रूप से निर्विरोध हो जाता है।
आरएसएस की कितनी भूमिका?
बीजेपी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक राजनीतिक इकाई माना जाता है। पार्टी के संविधान में संघ की औपचारिक भूमिका का उल्लेख नहीं है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर संघ की राय को काफी अहम माना जाता है। संगठन से जुड़े बड़े फैसलों में बीजेपी नेतृत्व और आरएसएस के बीच विचार-विमर्श होता है। पार्टी के राष्ट्रीय संगठन मंत्री परंपरागत रूप से आरएसएस से ही आते हैं, जिससे दोनों संगठनों के बीच समन्वय बना रहता है।
निष्कर्ष
बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष पार्टी के भीतर एक लंबी, सुव्यवस्थित और लोकतांत्रिक संगठनात्मक प्रक्रिया के जरिए चुना जाता है। इसमें चुनाव आयोग की कोई भूमिका नहीं होती, बल्कि पार्टी का संविधान, संगठनात्मक ढांचा और आपसी सहमति ही इस पद के चयन का आधार बनते हैं।
Corrospondent – Shanwaz Khan


