पश्चिम बंगाल की राजनीति में हुमायूं कबीर का सस्पेंशन एक साधारण अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि आने वाले चुनावी मौसम का सबसे बड़ा ‘टर्निंग पॉइंट’ बन चुका है। यह विवाद सिर्फ बाबरी मस्जिद के नाम पर दिए गए बयान या किसी जमीन पर होने वाले शिलान्यास की बात तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे राज्य में मुस्लिम राजनीति, वोट बैंक की दिशा और ममता बनर्जी की रणनीति को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है।
कौन हैं हुमायूं कबीर और क्यों बना उनका बयान विस्फोटक?
हुमायूं कबीर मुर्शिदाबाद के उन चंद नेताओं में से हैं जिनकी पकड़ ग्रामीण मुस्लिम वोटरों पर बेहद मजबूत है। उनकी राजनीतिक यात्रा बेहद दिलचस्प रही है—कांग्रेस से शुरुआत, मंत्री पद, फिर टीएमसी में शामिल होना, कुछ समय के लिए भाजपा में जाना और फिर दोबारा टीएमसी में वापसी। अनेक बार पार्टी बदलने के बावजूद उनकी लोकप्रियता लगातार बनी रही है।
मुर्शिदाबाद, रेजीनगर और भारतपुर क्षेत्र में कबीर को एक ‘मास लीडर’ के तौर पर देखा जाता है। उनके समर्थकों का मानना है कि कबीर वह नेता हैं जो सरकार के भीतर रहते हुए भी समुदाय के मुद्दों पर खुलकर बोलते हैं।
यही भरोसा उस वक्त और मजबूत हो गया जब उन्होंने 6 दिसंबर 2025 को मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में “बाबरी मस्जिद” के नाम पर एक स्मारक और विशाल इस्लामिक कॉम्प्लेक्स की आधारशिला रखने का ऐलान कर दिया। यह सिर्फ बयान नहीं, बल्कि सीधा राजनीतिक संदेश था। उन्होंने दावा किया कि 25 बीघा जमीन पर अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, रेस्ट हाउस, होटल, पार्क और हेलीपैड जैसी सुविधाएं बनाने की योजना है। उनका चुनौतीपूर्ण लहजा—”हुमायूं कबीर को कौन रोक सकता है?”—ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ाने वाला साबित हुआ।

ममता बनर्जी की मजबूरी और तत्काल एक्शन
ममता बनर्जी लंबे समय से स्वयं को देश की सबसे मुखर सेक्यूलर नेता के रूप में प्रस्तुत करती रही हैं। लेकिन बंगाल की बदलती राजनीतिक हवा में उन्हें यह भी पता है कि भाजपा का ‘हिंदुत्व कार्ड’ कहीं उनके कोर हिंदू वोटरों को प्रभावित न कर दे।
ऐसे में हुमायूं कबीर का बाबरी मस्जिद के नाम पर शिलान्यास का ऐलान सीधे-सीधे भाजपा को प्रचार का हथियार थमा सकता था। भाजपा तुरंत इसे ‘अतिरिक्त तुष्टिकरण’ या ‘हिंदुओं के अपमान’ के रूप में भुनाती और ध्रुवीकरण की राजनीति को हवा मिलती।
इसी आशंका के चलते टीएमसी महासचिव फिरहाद हकीम ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कबीर को सस्पेंड कर दिया। उन्होंने कहा, “टीएमसी धर्म के नाम पर राजनीति नहीं करती। कबीर भाजपा की मदद कर रहे हैं और बंगाल का माहौल खराब करना चाहते हैं।” ममता बनर्जी ने भी अपनी रैली में बिना नाम लिए कहा कि वे सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा देने वालों के खिलाफ हैं।
क्या मुस्लिम वोट बैंक खिसक सकता है?
यहीं से ममता के लिए सबसे बड़ा संकट शुरू होता है।
पश्चिम बंगाल की लगभग 30% आबादी मुस्लिम है, और मुर्शिदाबाद, मालदा व उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में यह 60–70% तक पहुंचती है। यह वोट बैंक अब तक भारी संख्या में टीएमसी के साथ रहा है।
कबीर का सस्पेंशन मुस्लिम समाज में यह संदेश दे रहा है कि ममता बनर्जी हिंदू वोटरों को नाराज करने से डर रही हैं और ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की राह पर बढ़ गई हैं। जबकि राम मंदिर जैसे मुद्दों पर भाजपा खुलकर खड़ी है, वहीं टीएमसी अपने ही मुस्लिम नेता पर कार्रवाई कर रही है।
कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने तंज कसते हुए कहा कि टीएमसी ने कबीर का इस्तेमाल कर अब उन्हें ‘फेंक’ दिया है। यह बात मुस्लिम समुदाय के एक बड़े हिस्से को टीएमसी के प्रति अविश्वास की तरफ मोड़ सकती है।
अगर हुमायूं कबीर अलग राह चुनते हैं तो क्या होगा?
कई राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि कबीर ऐसे नेता नहीं हैं जो चुप बैठ जाएं। उन्होंने पहले ही संकेत दिया है कि वे पार्टी छोड़ने को तैयार हैं। अगर वे स्वतंत्र चुनाव लड़ते हैं या नई पार्टी बनाते हैं, तो तीन बड़े असर देखने को मिल सकते हैं—
- वोट कटवा की भूमिका
मुर्शिदाबाद की कम से कम 4-5 सीटों पर उनका सीधा प्रभाव है। वे 10-12 सीटों पर टीएमसी का समीकरण पूरी तरह बिगाड़ सकते हैं। - कांग्रेस और ISF को नई ऊर्जा
अगर कबीर, अब्बास सिद्दीकी (ISF) और कांग्रेस मिलकर तीसरा मोर्चा बनाते हैं तो यह मुर्शिदाबाद में टीएमसी को करारा झटका दे सकता है। - भाजपा को परोक्ष फायदा
मुस्लिम वोटों के बंटने का सीधा लाभ भाजपा को मिल सकता है। हिंदू वोट पहले ही भाजपा के साथ ज्यादा मजबूती से खड़े हैं। भाजपा सांसद खगेन मुर्मू भी इस घटनाक्रम को टीएमसी के अंत की शुरुआत बता रहे हैं।
6 दिसंबर का अल्टीमेटम और कानूनी मोर्चा
कबीर के शिलान्यास कार्यक्रम के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई है। अदालत से रोक लगती है, तो कबीर खुद को ‘पीड़ित’ बताकर मुस्लिम समाज की भावनाओं को और भड़का सकते हैं। यह विक्टिम कार्ड उनके लिए जमीन पर राजनीतिक ताकत में बदल सकता है।
क्या टीएमसी ने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी?
टीएमसी ने कबीर को केवल सस्पेंड किया है, निष्कासित नहीं। अधीर चौधरी ने इस पर भी निशाना साधते हुए कहा कि पहले भी उन्हें सस्पेंड कर फिर वापस ले लिया गया था। इससे संकेत मिलता है कि टीएमसी पूरी तरह दरवाजा बंद करने का जोखिम नहीं उठा रही।
टीएमसी को डर है कि यदि कबीर पूरी तरह अलग हो गए, तो बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाकों में टीएमसी की जमीन खिसक सकती है।
2021 बनाम 2024 और आने वाला चुनाव
2021 में टीएमसी ने मुर्शिदाबाद में लगभग क्लीन स्वीप किया था, पर 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और वामदलों की वापसी देखी गई। इससे साबित है कि मुस्लिम वोटर अब 100% टीएमसी के साथ नहीं हैं।
ऐसे में कबीर का बगावत करना टीएमसी के किले में बारूद भरने जैसा होगा।
निष्कर्ष: क्या ममता के लिए यह ‘आगे कुआं, पीछे खाई’ वाली स्थिति है?
हुमायूं कबीर का सस्पेंशन ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक तौर पर दोधारी तलवार है।
- अगर वे कबीर के बयान को नजरअंदाज करतीं तो भाजपा उन्हें ‘मुस्लिम appeasement’ का आरोप लगाकर घेरती।
- अगर वे कबीर पर कार्रवाई करती हैं (जो उन्होंने किया), तो मुस्लिम वोट बैंक में अविश्वास पैदा होने का खतरा है।
ठीक यही स्थिति बंगाल की राजनीति को अस्थिर कर रही है और आने वाले विधानसभा चुनावों में यह विवाद निर्णायक भूमिका निभाने की क्षमता रखता है।
Correspondent – Shanwaz khan


